रिश्तों की बुनियाद

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Vikas Jain
Vikas Jain
Nov 27 , 2018 12 min read 613 Views Likes 0 Comments
रिश्तों की बुनियाद

” रिश्तों की बुनियाद ” 

कहते कि परिवार बनाने के लिए अपनों की जरूरत होती हैं । पर सच बात यह है कि हम सब न यहाँ है ना वहाँ है बल्कि बहुत कोषों दूर है सब से । न जाने कितनी मिन्नते की होगी हमारें पूर्वजों न तब जाके कहीं एक सुकून वाला परिवार हम सब को नशीब हुआ । कितने ख्वाब सजाएँ होंगे हम सब के लिए। चार दिवारी का एक मंदिर जैसा मकान बनाया सब के लिए ।

आज हम सब कुछ नही जानते है कि हमारे लिए माँ बाबा ने कितने सपनों में सपनें सजायेंगे होंगे । पर आज हम सब उन तमाम रिश्तों का गला घोंट चुकें है सिर्फ अपने खुद के ख्वाब के लिए । जो न सच है न जूठ है पर जो भी है वो सहीं नही है। माँ , बाबा , भाई , बहन और न जाने कितने ऐसे रिश्ते है जो हम अब भूल चुके हैं । पहले पूरा परिवार साथ रहता था , साथ भोजन करते थे , सबको एक साथ एक छत के नीचे देखना पसन्द करते थे पर पता नही अब कहाँ जा रहें.

ओर जहां जा रहें ना वहां प्यार है न विश्वाश है, न प्रेम है, न कोई जज्बात है अगर है तो वो सिर्फ एक खुलापन उससे ज्यादा ओर कुछ नही । ओर इस खुलेपन की एक विष्ठता है अधूरापन , सूखापन , अकेलापन इससे ज्यादा ओर कुछ नही । 

परिवार का दूसरा नाम अपनापन होता है । अपने पास समय तो बहुत है पर अपने अनुरूप नही होता है यह कह देते है कि यार समय नही मिला , पर सच यह नही है बल्कि सच आप खुद अपनी अंतरात्मा से जानते है । 

आज हम सब बस हाय , हैलो बोलकर अपनापन दिखादेते है पर दिलों में एक दूसरे के प्रति प्यार नही है  बल्कि यह सोचते है कब यह यहाँ से निकल ले । 

फिर भी कहते है ” हम सब साथ साथ हैं ”

कितना अजीब रिश्ता है !

आज हम केवल रिश्ते नातें TV  और Serials में देखते ओर वहाँ भी जूठापन होता है । जिस दिन इन तमाम रिश्तों को समझ लेंगे उस दिन न मन्दिर ओर नही स्वर्ग जाने की जरूरत होगी क्योंकि यह दोनों अपने घर पर ही होंगे। 

अक्सर हम सब यह सोचतें है कि सब साथ रहें पर वक़्त की बंदिशों ने सब कुछ खत्म कर दिया फिर भी सोचते है चलों एक दिन ख्वाब  पुरें होंगे ।। 

लेखन: विकास जैन ~विक्सा~


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