संस्कार और संस्कृति की विरासत

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Rakhi R Wadhwani
Oct 8 , 2018 29 min read 91 Views Likes 0 Comments
संस्कार और संस्कृति की विरासत

संस्कृति अपनी भाषा में निबद्ध होती है | भाषिक परिवर्तन संस्कृति के स्वरुप को भी परिवर्तित करता है और भाषा की मृत्य संस्कृति को भी मारती है | भारतीय संस्कृति भारत की बहुभाषायी अस्मिता पर आधारित बहुआयामी संस्कृति की एकता की परिचायक है | ऐसे में भारतीय भाषाओँ में अंग्रेजी का वर्चस्व भारतीय संस्कृति में भी पश्चिम के वर्चस्व को स्थापित करता है | जिस तरह भाषिक अभिव्यक्ति मिक्स होती जा रही है, उसी तरह सांस्कृति अभिव्यक्ति भी | आज के युवाओं के पहनावे, साज - श्रृंगार, संवाद - विवाद का तरीका, सुख और सुविधाओं के आधारभूत तत्त्व और परम्परागत रीति - रिवाजों के प्रदर्शन का स्वरुप भारतीय संस्कृति की नव्यात्मकता को स्पष्ट कर देता है |

जानते है : भारतीय संस्कृति क्या है ? युवा पीढ़ी क्या भारतीय संस्कृति के मूल्य को समझती है ?

राष्ट्र का बाल एवम् युवा वर्ग राष्ट्र का भावी निर्माता है । वे भावी शासक, वैज्ञानिक, प्रबन्धक, चिकित्सक हैं । किन्तु आज के युवा वर्ग के अपराधों में लिप्त होने के समाचार “युवा एवम् अपराध” नामक शीर्षक से जब हम समाचार पढ़ते हैं तो यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि युवा वर्ग हमारे प्रचीन सांस्कृतिक चिंतनों से दूर क्यों होता जा रहा है ? आज युवाओं का बड़ा वर्ग विभिन्न जघन्य अपराधों में शामिल क्यों है? आज का युवा किसे आदर्श मान रहा है, किससे प्रेरित हो रहा है? भविष्य का मार्ग निश्चित करने के बारे में उसकी सोच क्या है? आज हमारे ही बच्चे पथभ्रष्ट हो रहे हैं, उन्हें नहीं पता कि वे किससे प्रेरणा लें।

भाषा न जानने पर हम अपनी संस्कृति से कट जाते हैं । अंग्रेजों ने भारत से उसकी भाषा छीन ली । बिना अपनी भाषा के बुद्धि श्रेष्ठ उत्पादन कैसे दे सकती है? हमारे देश में अंग्रेजी भारत की सृजनात्मक तथा शोधात्मक प्रतिभा को अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है । यह समस्या अत्यन्त गंभीर है । अगर समय रहते उपाय न किये गये तो इसके दूरगामी और घातक परिणाम होंगे । हमें यह मानना होगा कि भारतीय संस्कृति, हिन्दी या किसी भारतीय भाषा में ही पनप सकती है ।

गांधी जी ने कहा था –“ स्वतंत्रता के पश्चात चाहे अंग्रेज यहाँ रहें, किंतु अंग्रेजी एक भी दिन न रहे ।”अंग्रेजी ने हमें प्रौद्योगिकी और विज्ञान के क्षेत्र में न केवल पीछे किया है बल्कि हमारी संस्कृति को भी भ्रष्ट कर दिया है । पाश्चात्य संस्कृति हमें व्यक्तिवादी एवं भोगवादी बना रही है । जब अंग्रेजी का भारत पर पूरा वर्चस्व हो गया है तो अंग्रेजी ने हमें पिछड़ा क्यों बना दिया, यह प्रश्न उठता है? हमारा बाल एवम् युवा वर्ग वर्तमान समय में एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है । युवा अपनी प्रतिभा व परिश्रम के बल पर वर्तमान दुनिया की मांगों के अनुसार स्वयं को तैयार कर सकता है । किन्तु जब हिन्दी को प्रोत्साहन नहीं मिलता है और युवा वर्ग अपनी संस्कृति से अनभिज्ञ रह जाता है, तो सोचना आवश्यक हो जाता है ।

हमारे युवा वर्ग के पास नित नए-नए प्रश्न हैं । वे समाधान खोज रहे हैं । नए समाज की रचना हो रही है । हर दिन ज्ञान विकसित हो रहा है । विकसित होते हुए ज्ञान को यदि हम अपनी भाषाओं में युवा वर्ग तक नहीं ले जाएँगे तो वह उस ज्ञान से वचिंत रह जाएगा ।

भारत को हिंदी की आवश्यक्ता है अन्यथा अंग्रेजी विद्यालयों का चलन, विदेशों की ओर गमन और अंग्रेजी को नमन भारत को ऐसे कगार पर ले जाएगा कि भारत की भारतीयता खो जाएगी । मान लीजिये कि शार्कों से भरे समुद्र में एक जहाज जा रहा है । वह डूबने लगता है । हर तरफ अफरा तफरी मच जाती है । सब अपनी जान बचाना चाहते हैं परन्तु एक व्यक्ति चैन से सो रहा है कप्तान ने उससे कहा: “ भाई तुम सो क्यों रहे हो । क्या तुम्हें पता नहीं कि जहाज डूब रहा है ?”

“पता है, डूबने दो ।“

“क्यों, कप्तान चौंक गया ।“

“यह जहाज मेरा थोड़े ही है, मैने इसपर खर्च थोड़े ही किया है, डूबे। ”

हर भारतीय की स्थिति उस आदमी की तरह है जिसे समझ में नहीं आ रहा कि जब जहाज डूबेगा, आसमान से कोई फरिश्ता उसे बचाने नही आएगा । विड़म्बना यह है कि सारा विश्व हिंदी को हिंदुस्तान की भाषा मानता है, लेकिन हमें उसे अपनाने में लज्जा आती है । अपनी भाषा के महत्व को समझना अत्यंत आवश्यक है । जब नन्हा शिशु अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में प्रवेश लेता है तब हिंदी के हजारों सीखे शब्द भी उसके लिए व्यर्थ हो जाते हैं । अंग्रेजी की उंगली पकड़ नए सिरे से चलना सीखना उसकी मजबूरी होता है । न भाषा समझ में आती है, न विषय समझ में आता है । बार-बार असफल होते हुए उनका मनोबल टूट जाता है ।

हमें याद रखना चाहिये कि हिंदी में अभी भी कुशल हिंदी सेवी, हिंदी में आस्था रखने वाले हिंदी लेखक हैं । हम देख रहे हैं कि हिन्दी भाषा “विश्व भाषा” का रूप ले रही है । किन्तु हमारी भावी पीढ़ी – हमारे बाल एवम् युवा वर्ग की भी भाषा हिन्दी होनी चाहिये, इस दिशा में भी प्रयास होने चाहिये ।

अंत में यह कहना चाहूंगी कि संस्कार और संस्कृति की विरासत को बाल एवम् युवा वर्ग संभाले।


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